देश में नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद अब जांच प्रक्रिया में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। इसी कड़ी में बिहार के DGP विनय कुमार का एक अहम बयान सामने आया है, जिसने कानून-व्यवस्था और अपराध के आंकड़ों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। दरअसल, पटना स्थित बिहार पुलिस मुख्यालय में दो दिवसीय “सेटेलाइट वर्कशॉप” का आयोजन किया गया है। इस वर्कशॉप में बिहार विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) के वैज्ञानिकों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों के फॉरेंसिक विशेषज्ञ और विदेश से आए छात्र भी शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य फॉरेंसिक जांच को और अधिक मजबूत और आधुनिक बनाना है।

कार्यक्रम के दौरान DGP विनय कुमार ने वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कहा कि नए कानूनों के लागू होने के बाद फॉरेंसिक जांच की भूमिका काफी बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि एक समय था जब पूरे साल में करीब 300 मामलों की जांच फॉरेंसिक तरीके से होती थी, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज बिहार में रोजाना लगभग 300 मामलों की वैज्ञानिक तरीके से जांच की जा रही है।

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DGP ने यह भी कहा कि आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ेगी, क्योंकि राज्य के हर जिले में फॉरेंसिक यूनिट स्थापित की जा चुकी है। इससे जांच की गति तेज होगी और अपराधियों के खिलाफ साक्ष्य और मजबूत होंगे। हालांकि, DGP के इस बयान ने एक नया सवाल भी खड़ा कर दिया है। एक तरफ बिहार सरकार लगातार दावा कर रही है कि राज्य में अपराध के ग्राफ में कमी आई है, वहीं दूसरी तरफ रोजाना सैकड़ों मामलों की फॉरेंसिक जांच यह संकेत देती है कि संज्ञेय अपराधों की संख्या अब भी कम नहीं हुई है।

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गौरतलब है कि फॉरेंसिक जांच आमतौर पर गंभीर अपराधों—जिनमें सात साल या उससे अधिक सजा का प्रावधान होता है—में की जाती है। ऐसे में अगर रोजाना 300 के करीब मामलों की वैज्ञानिक जांच हो रही है, तो यह साफ संकेत देता है कि राज्य में गंभीर अपराधों की चुनौती अभी भी बरकरार है। अब देखना यह होगा कि बढ़ती फॉरेंसिक क्षमता अपराध नियंत्रण में कितना असर डाल पाती है, या फिर ये आंकड़े किसी बड़े सच की ओर इशारा कर रहे हैं।

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